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रविवार, 13 मार्च 2011

कुछ अहसास कुछ इलज़ाम/ विश्व भूषण

कुछ अहसास कुछ इलज़ाम लेकर चले आये,
जिसे जिसकी तमन्ना थी, देकर चले आये॥

यहाँ जब, दिल में भी दुकानें सजने लगीं,
कुछ यादें समेट, हम बेघर चले आये॥

वो मयकश निगाहें, जो देखीं फिसलती,
अकेले पीने वाले हम, उठकर चले आये॥

अलविदा कहने का हमको हौसला न था,
इसलिए जो भी हुआ, सुनकर चले आये॥

ना आते भी अगर, क्या हो गया होता?
और बहकते कदम, कि सम्हलकर चले आये॥

2 टिप्पणियाँ:

neeloo ने कहा…

Na aate bhi aggar , kya ho Gaya hota??
Aur bahekte kadam, Ki sambhalkar chaale aaye...

neeloo ने कहा…

Kisse jiski tammanna thi.. Deekar chale aaye..

Kya baat hai...