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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है / दुष्यंत कुमार

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या हो, आकाश-सी छाती तो है।

1 टिप्पणियाँ:

पद्म सिंह ने कहा…

अद्भुद गज़ल... हाय रे ब्लॉग जगत... अनमोल मोतियों पर एक भी टिप्पणी नहीं... और कहीं कौवे मोती चुन रहे हैं