क्या हुआ, लबों तक जाम न आने पाया,
हम तक तेरी वफ़ा का पैगाम न आने पाया।
बहुत ज़ब्त करने की रही कोशिश तो हमारी,
पर हौसला ये भी मेरे काम न आने पाया।
रो रो के, हंस हंस के, किस्से तेरे बता डाले,
एहतियात रखी मगर, तेरा नाम न आने पाया।
तू भटका, कोई बात नहीं, सुबह का भटका,
ग़म है, ये भटका, घर शाम न आने पाया।
मेरी नियत तो साफ़ थी, तेरा ज़मीर कैसा था,
मोहब्बत में जो चाहा वही अंजाम न आने पाया.....
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3 टिप्पणियाँ:
तू भटका, कोई बात नहीं, सुबह का भटका,
ग़म है, ये भटका, घर शाम न आने पाया
एक एक शे'र लाजवाब ...
Ro Ro ke hans Hans ke kisse tere Basra daale
Airihaat rake magar Tera naam na aane paaya..
Kya baat hai ... Wah...
I would like to thank Mr. Sanjay Dixit,who has led me to this great treasure of wonderful literature.
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