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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्या हुआ, लबों तक जाम न आने पाया / विश्व भूषण

क्या हुआ, लबों तक जाम न आने पाया,

हम तक तेरी वफ़ा का पैगाम न आने पाया।


बहुत ज़ब्त करने की रही कोशिश तो हमारी,

पर हौसला ये भी मेरे काम न आने पाया।


रो रो के, हंस हंस के, किस्से तेरे बता डाले,

एहतियात रखी मगर, तेरा नाम न आने पाया।



तू भटका, कोई बात नहीं, सुबह का भटका,

ग़म है, ये भटका, घर शाम न आने पाया।


मेरी नियत तो साफ़ थी, तेरा ज़मीर कैसा था,

मोहब्बत में जो चाहा वही अंजाम न आने पाया.....

3 टिप्पणियाँ:

पद्म सिंह ने कहा…

तू भटका, कोई बात नहीं, सुबह का भटका,

ग़म है, ये भटका, घर शाम न आने पाया

एक एक शे'र लाजवाब ...

neeloo ने कहा…

Ro Ro ke hans Hans ke kisse tere Basra daale
Airihaat rake magar Tera naam na aane paaya..

Kya baat hai ... Wah...

Shahid Fazal ने कहा…

I would like to thank Mr. Sanjay Dixit,who has led me to this great treasure of wonderful literature.