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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

तुमसे मिलने को चेहरे बनाना पड़े/ वसीम बरेलवी

तुमसे मिलने को चेहरे बनाना पड़े,
क्या दिखाएँ जो दिल भी दिखाना पड़े।

ग़म के घर तक न जाने कि कोशिश करो,
जाने किस मोड़ पर मुस्कुराना पड़े।

आग ऐसी लगाने से क्या फायदा,
जिसके शोलों को खुद ही बुझाना पड़े।

कल का वादा न लो कौन जाने कि कल,
किस को चाहूं, किसे भूल जाना पड़े।

खो न देना कहीं ठोकरों का हिसाब,
जाने किस-किस को रस्ता बताना पड़े।

ऐसे बाज़ार में आये ही क्यों 'वसीम',
अपनी बोली जहाँ खुद लगाना पड़े॥

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