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बुधवार, 7 सितम्बर 2011

किस पर विश्वास करूँ, किसका विश्वास करूँ? / विश्व भूषण

किस का विश्वास करूँ?
किस पर विश्वास करूँ?
जब आये दिन,
हो जाता है कहीं भी,
कभी भी,
कैसा भी धमाका...

किस पर विश्वास करूँ?
सहमी हुई दिल्ली कि छाती पे बैठा,
एक लुंगी वाला मद्रासी होम मिनिस्टर,
कलंकित करता है,
राजगोपालाचारी के आदर्श
और सुब्रमण्यम भारती कि कवितायेँ,
अपने कायरता भरे बयानों,
और धनलोलुप जिह्वा के बहकाव से...

किस का विश्वास करूँ?
भ्रष्टाचार से त्रस्त राष्ट्र का मुखिया,
पगड़ी कि खालसा शान को,
चढ़ा देता है,
एक "गुप्त रोग" से पीड़ित महिला के,
चरणों में,
और अपनी बेटी से इतिहास में लिखवाता है,
यीशु महान और गुरु गोबिंद सिंह लुटेरा था,
और लजाता है, बंद बहादुर से लेकर,
ऊधम सिंह और भगत सिंह तक कि परंपरा को?

किस पर विश्वास करूँ?
देश का शिक्षा मंत्री,
रोज झूठ बोलता है,
कभी "टू जी" को "सच्चा सौदा",
और कभी "कामन वेल्थ" को "अच्छा सौदा" कहकर,
बेईमानी के खिलाफत्गारों को जेल,
और आतंकवादियों को बहार करवाने कि,
दलाली भरी वकालत करता न्यायलय में नजर आकर...
रुलाता है डाक्टर राधाकृष्णन की आत्मा को...

किस का विश्वास करूँ?
लोकतंत्र का "चौथा स्तम्भ",
बड़ी निर्लज्जता से,
लोकतान्त्रिक राष्ट्र का,
एक "राजकुमार" घोषित करता है।
जो, न देश का नागरिक है,
न अपनी बुद्धि से बोलना जानता है,
न तो बेदाग है,
न ही सच्चरित्र,
जो, बलात्कार का आरोपी, और "ड्रग-एडिक्ट" भी बताया जाता है...

किस पर विश्वास करूँ?
आज का विद्रोही,
कल भ्रष्टो के खेमे में नज़र आता है,
"अनशन वीर" हठयोगी,
सरकारी शर्तों पर समझौता कर,
"जीत गए हम जीत गए" के गाने गाता है...

किस का विश्वास करूँ?
शीत रक्त युवा,
सिर्फ नारे लगाना और झंडे लहराना जानता है,
न मुद्दे समझ पाता है,
न समझौते पढ़ पाता है,
और बीस लोगों का दल,
कुछ सरकारी खलनायकों,
और माइक कैमरा वाले जोकरों के साथ,
पूरे देश को टोपी पहना जाता है...

किस पर विश्वास करूँ?
हर तरफ से लुटे पिटे, ये आम लोग,
विरोध से विरत, मुर्दा लोग,
मेरे देश के निन्यानबे प्रतिशत "शांत चित्त" लोग,
सदियों से मार सहते, आपस में लड़ते,
और धूर्तों कि गुलामी करते लोग,
कभी भगत सिंह को आतंकवादी कहते,
कभी गुरु गोबिंद सिंह को लुटेरा,
और कभी,
निजाम बदला, तो स्वर बदल लेने वाले लोग...

क्या इन पर विश्वास करूँ?
जो अन्याय और बेईमानी सह कर भी,
विरोध के लिए खुद टोपी पहन लेते हैं,
और सशक्त स्वर कि जगह,
अहिंसा के चोचले अपना कर,
एक " मोमबत्ती उत्सव" मन कर,
फिर उसी पुराने ढर्रे पर चल देते हैं?...

किस पर विश्वास करूँ?
किस का विश्वास करूँ?

7 टिप्पणियाँ:

PRIYANKA RATHORE ने कहा…

bahut khoob...

bharat mishra ने कहा…

mind opening !!!!

bharat mishra ने कहा…

amazingly mind opening poem !!!

swarnima ने कहा…

kadwa hai hai par sach yahi hai jo apne likha hai...ab koi b vishwas paatra nazar nai aata...humara khoon thanda ho chuka hai....

deepak soni ने कहा…

desh ko bahut se bhagat singh chahiye ,,,,,vis bad gya h vishvas kam ho gya hai ,,,,,,,,ye asli sachai h ,,,,sir aap mahan hain ,,,,,,aap jaise logo ke karan hi desh khada h

deepak soni ने कहा…

desh ko bahut se bhagat singh chahiye ,,,,,vis bad gya h vishvas kam ho gya hai ,,,,,,,,ye asli sachai h ,,,,sir aap mahan hain ,,,,,,aap jaise logo ke karan hi desh khada h

JOBSOLUTION ने कहा…

desh ko bahut se bhagat singh chahiye ,,,,,vis bad gya h vishvas kam ho gya hai ,,,,,,,,ye asli sachai h ,,,,sir aap mahan hain ,,,,,,aap jaise logo ke karan hi desh khada h